विनोबा भावे | Vinoba Bhave Biography in Hindi
विनोबा भावे
अहिंसा और सद्भावना को अपने जीवन का मूलमंत्र मानने वाले आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को नासिक, महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था.
विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था।
आचार्य विनोबा भावे महात्मा गाँधी के सत्य और अहिंसा के विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे. काफी समय तक पत्रों के माध्यम से एक-दूसरे से वार्तालाप करने के बाद 7 जून, 1916 को विनोबा भावे पहली बार गांधी जी से मिले. पांच वर्ष बाद 1921 में विनोबा भावे ने महात्मा गांधी के वर्धा स्थित आश्रम के प्रभारी का स्थान ले लिया.
वर्धा में रहने के दौरान विनोबा भावे ने महाराष्ट्र धर्म के नाम से मराठी भाषा की एक मासिक पत्रिका निकालनी प्रारंभ की. इस पत्रिका में निबंध और उपनिषदों का प्रकाशन किया जाता था.
विनोबा भावे ने जन मानस को जागृत करने के लिए सर्वोदय आंदोलन शुरू किया था.
विनोबा भावे का सबसे मुख्य योगदान वर्ष 1955 में भूदान आंदोलन की शुरूआत करना था. वर्ष 1951 में तेलंगाना क्षेत्र के पोचमपल्ली ग्राम के दलितों ने विनोबा भावे से उन्हें जीवन यापन करने के लिए भूमि देने की प्रार्थना की थी.
विनोबा भावे ने क्षेत्र के धनवान भूमि मालिकों से अपनी जमीन का कुछ हिस्सा दलितों को देने का आग्रह किया. आश्चर्यजनक रूप से बिना किसी हिंसा के सभी भू स्वामी अपनी भूमि देने के लिए तैयार हो गए, यही से भूदान आंदोलन जैसे ऐतिहासिक आंदोलन की शुरूआत हुई.
विनोबा भावे एक बहुभाषी व्यक्ति थे. उन्हें लगभग सभी भारतीय भाषाओं (कन्नड़, हिंदी, उर्दू, मराठी, संस्कृत) का ज्ञान था.
विनोबा भावे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें वर्ष 1958 में अंतरराष्ट्रीय रेमन मैगसेसे सम्मान प्राप्त हुआ था. उन्हें यह सम्मान सामुदायिक नेतृत्व के क्षेत्र में प्राप्त हुआ था.
मरणोपरांत वर्ष 1983 में विनोबा भावे को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था.
नवंबर 1982 में विनोबा भावे अत्याधिक बीमार पड़ गए. उन्होंने अपने जीवन को समाप्त करने का निश्चय किया. वह ना तो कुछ खाते थे और ना ही दवाई लेते थे जिसके परिणामस्वरूप 15 नवंबर, 1982 को उनका निधन हो गया.
Some Quotes of Vinoba Bhave
सत्य को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती.
सीमा न रहने पर आज़ादी का कोई मोल नहीं.
यदि रोज एक ही रास्ते पर चला जाए तो हमें उसकी आदत लग जाती है, और हम अपने क़दमों पर गौर किये बिना अन्य तथ्यों के विषय में सोचते हुए चल सकते हैं.
हम अपने बचपन को दुबारा नहीं पा सकते. ये ऐसा है कि जैसे किसी ने एक स्लेट पर बचपन लिखा और कुछ देर के बाद उसे मिटा दिया.
एक देश अपनी स्मिता अपने पास रखे हथियारों से नहीं बल्कि अपने नैतिकता से बचा सकता है.
जीवन की गति को संयमित सीमा में रख कर जीने से ही एक मनुष्य का दिमाग़ स्वतंत्र रह सकता है.
